कभी कभी तो लगता है साला अपुनइच वायरस है! एक सबक जो कोरोनावायरस हमें सिखा रहा है।


ये कोई लेख नहीं है सिर्फ जीवन के मौजूद होने का अहसास है। कोरोनावायरस ने भले ही काल बनके इस धरती पर जन्म लिया हो परन्तु कुछ मायनों में इसने हमें यह महसूस करवा दिया है कि हम इंसानों की औकात क्या है। यह समुद्र मंथन के उस जहर जैसा है जिसको देवताओं और शैतानों के बीच की लड़ाई ने पैदा किया था। इस बार देवताओं का किरदार हमारी प्यारी प्रकृति निभा रही है और हर बार की तरह जीत भी इसी की होगी। अब जब हम इसके सन्तुलन को बिगाड़ने की कोशिश करेंगे तो परिणाम भी हमें ही भुगतने पड़ेंगे।

पर अब कितनी शांति है। बाहर छत पे जाओ तो प्रकृति से एक अजीब सा जुड़ाव महसूस होता है। इससे पहले तो भूल गए थे कि चिड़िया आवाज कैसे करती है, आसमां नीला होता है, परिवार नाम का प्राणि भी होता है, पेड़-पौधों को भी भाव देना पड़ता है। इस दर्दनाक माहौल में एक आनन्द सबके चहेरों पर आया जब सबने ये देखा की कोरोनावायरस की वजह से प्यारे प्यारे Penguins कैसे मस्त, अपनी मस्ती में बिना इंसानी खौफ के घूम रहे हैं। कैसे कोराना के घर, वूहान, में सालों बाद पझी दिखाई दिए।  पूरी दुनिया के इन्सानों को ये आनन्द महसूस हुआ होगा‌। अब मैं ये नहीं बोलूंगा कि खा विद्या की कसम

कोरोना के आने से पहले तो TikTok, Dating, Instagram से ही फुर्सत ना थी हमें। और अब देखो, दादा दादी नाना नानी , सबके साथ हो। जुड़ाव महसूस हो रहा है ना। वो क्या हैं ना कि जब तक हमें डंडा नहीं दिखता ना, हम ख्यालों से निकल के वर्तमान में नहीं आते।



कोरोनावायरस के आने से एक भ्रम तो इंसानों का जरुर टूट गया, वो ये कि इस बात में कोई सन्देह नहीं कि सारी की सारी गलती हमारी है। इस तूफान के आने की पूर्व सूचना प्रकृति को चाहने वालों ने दी थी। परन्तु हम सुनते किसी के बाप की भी नहीं है क्यूंकी शैतान जो ठहरे। अब साले शैतान सुनते तो हम सुने ना। हमनें अपने मर्जी का किया। कोई समझाने की कोशिश करता तो बोलते तू होता कौन है। ये मेरी जिंदगी है मैं अपने हिसाब से जिऊंगा। अब जी ना भाई अपने हिसाब से। निकल बाहर, मचा उत्पात। पर मेरे शेर, फटी पड़ी है तेरी। दुबक के बैठा है अपना फैजलवा और भाग रहा अपने गांव की ओर

ये हालात हमें ये सीख दे रहे हैं कि हमें हमारी मर्यादाओं में रहना चाहिए। कुछ हद तक जब प्रकृति ने हमें खाने पीने की अनुमति दे रखी है तो क्यूं कीड़ा करना है‌। अब सारे जानवरों को ही थाली में रखना चालू कर दोगे तो भाई, ये प्रकृति जानवरों की भी मां है और ये अपना सन्तुलन बनाना अच्छे से जानती है। और ये जो स्वयं की आजादी का ढिंढोरा पीट पीट के काफी जानवरों को इस धरती से मिटा गए, उनसे हाथ जोड़ के विनती है कि भाई रूक जा।

बात सिर्फ खाने तक सीमित नहीं है। जंगलों को गायब करना, प्रदूषण फैला के ज्ञान भरी बातें करना, पानी को अपनी बाप की जायदाद समझना, धर्म के नाम पे इन्सानियत को बेशर्म करना, ये सब ये ज्यादा समझदार और स्वयं-आजादी वाले दानव कर रहे हैं। चिन्ता मत करो, ओर भी कोरोना आएंगे भविष्य में। कब तक बचेगा ठाकुर

वो सब बातें पूरानी हो गई जब गांव शहरों में बच्चे इकठ्ठे होके किसी मैदान में इस खुबसूरत मिट्टी में खेला करते थे। अब हालात ये हैं कि बच्चे दूध तक नहीं पीते बिना मोबाइल फोन के। किसी किसी का तो टट्टी नहीं निकलता और थोड़ी मिट्टी लग जाए तो उनकी tik tok वाली मम्मियां OMG बोलते समय नहीं लगाती। ना ही वो लोग रहे जो इस धरती को हरा भरा रखने में कोई कसर छोड़ते थे। अब आप में से कई डेढ़ स्याणे ये सोच रहें होंगे की, ये कोरोना कोरोना करते बीच में ये बातें कहां से आ गई? तो सुनो, ये सब मानवीय हरकतें ही हमें इस प्रकृति से जोड़ के रखती है।

एक कहानी मुझे याद नहीं किसने सुनाई थी और क्या पता सच भी थी। परन्तु वो कहानी इस सीन में फिट बैठगी‌। दरअसल एक अमीर अरबी अपने छोटे छोटे बच्चों को मानसून के समय भारत घूमाने लाया। तो किसी ने उससे पूछा कि आप के पास तो इतना पैसा है कि आप यूरोप या अमेरिका घूम के आ सकते थे। उसने जवाब दिया की बात, यूरोप, अमेरिका और भारत की नहीं है‌। बात है कि मेरे बच्चों ने मुझसे पूछा की ये बरसात कैसी होती है? तो मैं मेरे बच्चों को बरसात का अनुभव करवाने भारत लाया हूं। अब ये कहानी भले ही किसी Dan Balzerian, Kim Kardashian या किसी ओर की ना हो। और सुनने में बोरिंग लगे। पर इसकी सीख हम सभी की औकात बताने के लिए काफी है। हमारा सम्बन्ध इस प्रकृति से है और ये हमें भूल के भी भूलना नहीं चाहिए।

तो अब अच्छा लग रहा है अब आपको यूं कैद होके बैठना। ओर करो कूचरनी प्रकृति के साथ। एक आध होंगे मेरे जैसे सनकी जिनको शायद अच्छा लग रहा होगा। पर कितने दिन ? ये कोरोना इतना आसानी से जाएगा नहीं। बड़ी बैंड बजायी है हम सबने इस पृथ्वी की। अब ये अच्छे से बजाएगी हम सबको। है कोई माई का लाल जो ये मंज़र रोक सके ? कोई नहीं है। सब साले चिन्ता में है। अरे मूर्खो अब भी सुधर जाओ। अपनी मैं को छोड़ो और इस जीवन को प्रकृति से जोड़ के रखो। अपनी आजादी को सीमित रखो। कोई नहीं रोकेगा तुम्हें। र तुम्हारे एक ग़लत कदम से प्रकृति का सन्तुलन बिगड़ेगा और फिर कोई कोरोना आएगा। फिर लाखों मासूम जाने जाएगी‌ और फिर तुम सोचोगे की "कभी कभी तो लगता है साला अपुनइच वायरस है"। धन्यवाद

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